गुरुवार, 18 दिसंबर 2025
मंगलवार, 24 दिसंबर 2024
मध्यप्रदेश के 10 पर्यटक स्थल, जहाँ आप आसानी से घूमने जा सकते हैं। देखें पूरी डिटेल्स।
मध्यप्रदेश: भारत का हृदय और 10 अद्वितीय पर्यटक स्थल
मध्यप्रदेश, जिसे भारत का हृदय प्रदेश भी कहा जाता है, अपने ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के अद्वितीय पर्यटक स्थल आपको भारत की समृद्ध विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक दिखाते हैं। आइए जानते हैं मध्यप्रदेश के 10 प्रमुख पर्यटक स्थलों के बारे में विस्तार से:
1. नरवर किला
नरवर किला शिवपुरी जिले में स्थित है और इसका ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व बहुत अधिक है। यह किला प्राचीन भारतीय योद्धाओं और राजाओं की वीरता का प्रतीक है। किले के अंदर विभिन्न मंदिर, महल और जलाशय हैं, जो इसके गौरवशाली अतीत की कहानी बयां करते हैं।| नरवर के प्राचीन किले का एरियल व्यू |
नजदीकी रेलवे स्टेशन: शिवपुरी रेलवे स्टेशन (लगभग 42 किमी)
सड़क मार्ग: नरवर तक सड़क मार्ग द्वारा ग्वालियर और शिवपुरी से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
2. खजुराहो
खजुराहो अपने अद्भुत और सुन्दर मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। यहाँ के मंदिर अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला और कामुक मूर्तियों के लिए विख्यात हैं। खासकर कंदारिया महादेव मंदिर और लक्ष्मण मंदिर दर्शनीय हैं।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: खजुराहो रेलवे स्टेशन
सड़क मार्ग: खजुराहो तक सड़क मार्ग द्वारा छतरपुर और सतना से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
सांची का स्तूप, जिसे मौर्य सम्राट अशोक ने बनवाया था, बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केन्द्र है। यहां की अद्भुत वास्तुकला और इतिहास प्रेमियों के लिए यह स्थान एक स्वर्ग के समान है। स्तूप के तोरण द्वार और शिलालेख इसकी खासियत हैं।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: सांची रेलवे स्टेशन
सड़क मार्ग: भोपाल से सांची तक सड़क मार्ग द्वारा लगभग 46 किमी की दूरी पर।
मध्यप्रदेश का इकलौता हिल स्टेशन पचमढ़ी अपने हरियाली, झरनों और गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है। सतपुड़ा की रानी कहलाने वाला यह स्थान शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य का अनोखा अनुभव प्रदान करता है।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: पिपरिया रेलवे स्टेशन (लगभग 50 किमी)
सड़क मार्ग: भोपाल और नागपुर से पचमढ़ी तक सीधी बस या टैक्सी उपलब्ध है।
भेड़ाघाट, जबलपुर के पास स्थित, अपनी संगमरमर की चट्टानों और धुआंधार जलप्रपात के लिए प्रसिद्ध है। यहां की चट्टानों के बीच नाव की सवारी करना अद्भुत अनुभव प्रदान करता है। रात्रिकालीन चांदनी में यह स्थान और भी रमणीय लगता है।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: जबलपुर रेलवे स्टेशन (लगभग 25 किमी)
सड़क मार्ग: जबलपुर से भेड़ाघाट तक टैक्सी और बस द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
उज्जैन, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का निवास स्थान है और यह शहर भारत के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। यहां कुंभ मेले का आयोजन होता है और कालिदास के महाकाव्य "मेघदूत" से इसका गहरा संबंध है।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: उज्जैन जंक्शन
सड़क मार्ग: इंदौर और भोपाल से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
ग्वालियर अपने ऐतिहासिक किले और संगीत प्रेमियों के लिए प्रसिद्ध है। ग्वालियर किला, जिसे "भारत का जिब्राल्टर" कहा जाता है, अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा, तानसेन का मकबरा संगीत प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण है।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: ग्वालियर जंक्शन
सड़क मार्ग: दिल्ली और आगरा से सड़क मार्ग द्वारा ग्वालियर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
ओरछा, बेतवा नदी के किनारे स्थित, अपने महलों और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां का राजमहल, जहांगीर महल और राम राजा मंदिर प्रमुख आकर्षण हैं। यह स्थान इतिहास और स्थापत्य कला प्रेमियों के लिए आदर्श है।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: झांसी रेलवे स्टेशन (लगभग 16 किमी)
सड़क मार्ग: झांसी से ओरछा तक टैक्सी या बस द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान भारत के सबसे सुंदर और व्यवस्थित राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। यह स्थान बाघ, बारहसिंघा और अन्य वन्य जीवों को देखने के लिए आदर्श है। रुडयार्ड किपलिंग की "जंगल बुक" की प्रेरणा भी यहीं से ली गई थी।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: जबलपुर रेलवे स्टेशन (लगभग 165 किमी)
सड़क मार्ग: जबलपुर और मंडला से कान्हा तक सीधी बसें और टैक्सियां उपलब्ध हैं।
मांडू, अपने रोमांटिक इतिहास और अद्वितीय स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है। यहां का जहाज महल, हिंडोला महल और रानी रूपमती महल देखने लायक हैं। मानसून के दौरान मांडू का सौंदर्य और भी निखर जाता है।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: रतलाम रेलवे स्टेशन (लगभग 124 किमी)
सड़क मार्ग: इंदौर और धार से मांडू तक सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
भीमबेटका की गुफाएं, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल हैं और यह स्थान प्रागैतिहासिक समय की चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है। यहां की गुफाएं प्राचीन मानव जीवन और उनकी कला का अद्भुत प्रमाण हैं।
कैसे पहुँचें:
नजदीकी रेलवे स्टेशन: भोपाल रेलवे स्टेशन (लगभग 45 किमी)
सड़क मार्ग: भोपाल से भीमबेटका तक सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
मध्यप्रदेश में ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों का एक अद्वितीय मिश्रण है। यहां का प्रत्येक स्थान अपने आप में अनूठा और दर्शनीय है। यदि आप इतिहास, संस्कृति और प्रकृति के प्रेमी हैं, तो मध्यप्रदेश आपकी यात्रा सूची में अवश्य होना चाहिए।
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शुक्रवार, 7 जून 2024
ग्वालियर से नरवर की दूरी, दिशा, किराया और आवागमन के लिए उपलब्ध साधनों की सम्पूर्ण जानकारी
श्री लोढीमाता की पवित्र पावन भूमि नरवर मध्यप्रदेश के ग्वालियर संभाग अंतर्गत आने वाले शिवपुरी जिले में स्थित है। राजा नल-दमयंती की ऐतिहासिक नगरी नरवर का उल्लेख महाभारतकाल में नलपुर के नाम से मिलता है। नरवर अपने इतिहास, विरासत, प्रकृति और लोढीमाता के चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्राचीन नरवर किला, श्री लोढीमाता मंदिर, श्री टपकेश्वर महादेव, मडीखेडा बाँध, मोहनी सागर बाँध तथा ग्वालियर जिले में नरवर की सीमा से लगा हुआ हरसी बाँध जैसे बडे-बाँध तीर्थ स्थल और पर्यटक स्थल के रूप में विद्यमान हैं। इसके अलावा नरवर में अनेक झील, झरने, तालाब और सिंध नदी का रमणीक तट भी मनमोहक है।
गुरुवार, 3 नवंबर 2022
नरवर नगर परिषद ने मनाया अनूठा उत्सव, मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर कार्यालय में स्कूली बच्चों ने बनाईं सुन्दर कलाकृतियाँ
नगर परिषद कार्यालय में स्कूली बच्चों ने बनाईं सुंदर कलाकृतियाँ, मंत्री जी ने अवलोकन कर, की सराहना।
नरवर दर्शन. मध्यप्रदेश के 67वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में प्रदेश भर में 01 नवम्बर से 7 नवम्बर तक विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। जिसके क्रम में नगर परिषद नरवर में भी रंगोली, पेंटिंग्स और स्वच्छता श्रमदाम कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। जिसमें नरवर के विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने सुंदर रंगोलियाँ और पेंटिंग्स बना कर नगर परिषद कार्यालय के सुंदरता में चार चाँद लगा दिए।
बच्चों द्वारा बनाई गई रंगोली और पेंटिंग्स का अवलोक श्री जसवंत जाटव, केबिनेट मंत्री दर्जा, मध्यप्रदेश पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम अध्यक्ष ने किया और छात्र-छात्राओं की प्रतिभा की सराहना की। खिलते हुए रंगों और महकते फूलों से बनी रंगोलियों ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कला और संस्कृति की विशेष परख रखने वाली नगर परिषद अध्यक्ष श्रीमति पदमा संदीप माहेश्वरी जी ने स्वयं बच्चों के साथ मिलकर रंगोली बनाई और रंगोलियों का अवलोकन कर छात्र-छात्राओं की कलात्मक प्रतिभा की सराहना की और मार्गदर्शन दिया।
स्कूली नन्हें कलाकार बच्चों को संबोधित करते हुए श्री जसवंत जाटव, पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम चेयरमेैन कैबिनेट मंत्री दर्जा ने कहा कि - मध्यप्रदेश अपना 67वां स्थापना दिवस मना रहा है। प्रदेश के मुखिया यशस्वी मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने नईं ऊँचाईयों को छुआ है और कला, संस्कृति, पर्यटन, उद्योग आदि क्षेत्रों में नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उन्होंने कहा कि नरवर को पर्यटन के क्षेत्र में आगे बढाने के लिए अनेक योजनाएँ तैयार की गयी हैं, जिन्हें अमली जामा पहनाया जा रहा है और हमारा नरवर पर्यटन पटल पर एक प्रमुख स्थान होगा। नरवर के विभिन्न शासकीय-अशासकीय विद्यालयों के बच्चों से रूबरू होते हुए मंत्री जी ने कहा कि जैसे श्री शिवराज सिंह चौहान जी पूरे प्रदेश के बच्चों के मामा हैं, तो आज से मैं करैरा विधानसभा के सभी बालक-बालिकाओं का मामा हूँ। जब मंत्री जी ने बच्चों से पूछा कि क्या आपको मंजूर है, तो सभी बच्चों ने एक सुर हाँ कहकर मामा-भांजे के इस संबंध का समर्थन किया।
कार्यक्रम में रंगोली और पेंटिंग्स बनाने वाले बच्चों को मंत्री जी, अध्यक्ष जी, नप सीएमओ और नप पार्षदगणों द्वारा प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कार प्रदान किये गये। मंत्री जी ने बच्चों की सुन्दर पेंटिग्स पर अपनी स्वेच्छा से ही ऑटोग्राफ दिये और उन्हें संभालकर कार्यालय में प्रदर्शित करने के निर्देश दिये। कार्यक्रम में स्वागत भाषण और आभार उपयंत्री श्री आरके जैन ने दिया और मंच संचालन नगर परिषद के पवन सिंह बैश ने किया।
रंगोली-पेंटिंग्स कार्यक्रम के समापन के बाद पुराना थाना ग्राउण्ड में नपाध्यक्ष एवं पार्षदगणों और निकाय के अधिकारी-कर्मचारियों द्वारा सफाई मित्रों के साथ श्रमदान किया गया।
मध्यप्रदेश स्थापना दिवस के इस रंगोली-पेंटिग्स कार्यक्रम में मुख्यरूप से श्री जसवंत जाटव, पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम अध्यक्ष, नगर परिषद नरवर अध्यक्ष श्रीमति पदमा माहेश्वरी, नप उपाध्यक्ष श्री ब्रजेन्द्र गुर्जर, नप सीएमओ श्री प्रवीण कुमार नरवरिया, , नप पार्षदगण श्री धर्मेन्द्र कुशवाह, श्री बालकिशन कुशवाह, श्री राकेश गुड्डू सोनी, श्री शंकरलाल रजक, श्री मनोज मित्तल, श्री टीपू खान एवं नगर परिषद उपयंत्री श्री आरके जैन, लेखापाल श्री अशोक कुमार शिवहरे, एआरआई श्री हबीब मोहम्मद कुर्रैशी, एआरआई श्री धर्मेन्द्र कुमार कोली, श्री दीपक खटीक, श्री अरविन्द शर्मा, श्री गजेन्द्र राठौर, श्री पुरुषोत्तम शिवहरे, श्री पवन सिंह बैश, श्री अंकुर जैन, श्री सुरेश चौरसिया, श्री मनोज सक्सैना, श्री जावेद कुर्रैशी, श्री पंकज चौरसिया, श्री सतीश बाथम, श्री छोटू एवं नरवर की आँगनवाडी कार्यकर्ता/सहायिका एवं शासकीय सीएम राइज विद्यालय, शासकीय कन्या विद्यालय, अशासकीय भारतीय विद्यालय, शौर्य स्कूल, उत्कर्ष विद्यालय के अध्यापक एवं छात्र-छात्राएँ शामिल रहे।
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022
नरवर में दो पर्यटन मित्रों की नियुक्ति: पर्यटन को मिलेगी उड़ान, इसे बढ़ावा देने के लिए मिले 2 पर्यटन मित्र
| नरवर में नियुक्त हुए दो पर्यटन मित्र Shivam Singh Parmar और Deepak Singh Parihar |
(साभारः दैनिक भास्कर)
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नरवर दर्शन
भारतीय इतिहास, विरासत, पर्यटन, प्रकृति, शिक्षा, साहित्य, कला और संस्कृति का संवाहक
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रविवार, 19 अप्रैल 2020
नरवर दुर्ग : इंग्लैण्ड के पुरातत्वेत्ता Kevin Standage की नज़र से। (An Article in English)
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| पिसनहारी दरवाजे के ऊपर का रास्ता |
Perched on top of an irregular hill 500 feet above the town, Narwar Fort is 70 km south-west of Gwalior in the Shivpuri district of Madhya Pradesh. I have struggled to find much information regarding this fort, so almost all the information here will come from the Archaeological Survey of India Volume II 1864-65 by Alexander Cunningham. Clearly Narwar Fort is not visited very frequently if I’m having to rely on a document that is 155 years old














There are no remains from the Hindu period at Narwar Fort except for a handful of inscriptions, none of which I found or even knew about prior to my visit. All the Hindu structures were obliterated by Sikandar Lodhi in 1508 AD. Ferishta records that Sikandar’s men remained at the fort for six months tearing down temples and building mosques and other structures.



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So what remains today are Moghul structures, but their number and magnificence would seem to indicate that at its zenith of Mughal occupation, Narwar Fort was second only to Gwalior Fort.


The circumference of the fort is nearly 5 miles, if you want to see everything inside it could take the best part of a day. In all likelihood you will be the only tourist here, on my visit I had the fort completely to myself to explore aside from a few locals who had walked up the hill for some exercise.



In some respects this fort is similar to Gohad Fort that I had visited a few days earlier, although here everything is on a much larger scale and the state of preservation is a significantly better in places.


















“This district is called after the neighbouring town; its savage inhabitants knowing that they can commit robberies with impunity, are wont to attack travellers from ambush and to carry off their goods as plunder.”





:: साभार ::





