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मंगलवार, 9 जून 2026

Historical facts about Narwar: नरवर का प्रामाणिक इतिहास, 10 ऐतिहासिक घटनाएं और तथ्य

Historical facts about Narwar: नरवर का प्रामाणिक इतिहास, 10 ऐतिहासिक घटनाएं और तथ्य
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध नरवर अंचल का इतिहास जितना गहरा है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी इसके तथ्यों को सही रूप में पाठकों तक पहुंचाने की है। 'नरवर दर्शन' ब्लॉग की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए, नीचे नरवर के इतिहास से जुड़ी 10 पूर्णतः तथ्यपूर्ण, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित और प्रामाणिक कहानियों (घटनाओं) की विस्तृत सीरीज दी जा रही है।

इनमें किसी भी प्रकार की काल्पनिक लोककथा या भ्रामक तथ्यों को शामिल नहीं किया गया है, बल्कि ये सभी घटनाएं इतिहास के पन्नों, राजकीय अभिलेखों (Gazetteers) और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित हैं।

1. सिकंदर लोदी का नरवर पर ऐतिहासिक आक्रमण (वर्ष 1506-1508)

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: यह घटना पूरी तरह प्रमाणित है, जिसका उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुल्लाह की किताब 'तारीख-ए-दाऊदी' और निज़ामुद्दीन अहमद की 'तबाकत-ए-अकबरी' में मिलता है।

विस्तृत विवरण:

सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत में नरवर का किला तोमर राजपूत राजाओं के नियंत्रण में था। दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने मालवा और बुंदेलखंड पर नियंत्रण पाने के लिए नरवर के रणनीतिक महत्व को समझा। साल 1506 में लोदी की विशाल सेना ने नरवर के किले को चारों तरफ से घेर लिया। यह घेराबंदी (Siege of Narwar) लगभग एक साल से अधिक समय तक चली। किले के भीतर मौजूद राजपूत सैनिकों ने डटकर मुकाबला किया, लेकिन रसद (भोजन-पानी) खत्म होने के कारण तोमर राजा को आत्मसमर्पण करना पड़ा। सिकंदर लोदी ने किले पर कब्जा करने के बाद यहाँ कई ऐतिहासिक इमारतों और मस्जिदों का निर्माण कराया और लगभग 6 महीने तक खुद नरवर में रुका था।

2. मुगल सम्राट अकबर का नरवर आगमन और 'शिकार' के शाही अभिलेख (वर्ष 1564)

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: अबुल फजल द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ 'अकबरनामा' और उस काल के मुगल लघुचित्रों (Miniature Paintings) में इस घटना का स्पष्ट और प्रामाणिक वर्णन है।

विस्तृत विवरण:

मुगल साम्राज्य के विस्तार के दौरान अकबर के लिए मालवा और दक्षिण भारत का रास्ता साफ करने के लिए नरवर का सुरक्षित होना जरूरी था। 1564 में जब अकबर मालवा के विद्रोह को शांत करने के लिए जा रहा था, तब वह अपनी सेना के साथ नरवर के घने जंगलों में रुका था। अकबरनामा के अनुसार, नरवर के जंगलों में अकबर ने एक ही दिन में शेरों के एक पूरे झुंड का शिकार किया था, जिसे उस समय उसकी वीरता का प्रतीक माना गया। इसके बाद अकबर ने नरवर को एक 'सरकार' (मुगल प्रशासनिक जिला) घोषित किया और यहाँ शाही टकसाल (Mint) की स्थापना की, जहाँ तांबे के सिक्के ढाले जाते थे।

3. कछवाहा राजवंश और राजा नलपुर देव का अभिलेख (9वीं शताब्दी)

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: ग्वालियर के पास मिले सास-बहू मंदिर के शिलालेख (वर्ष 1093) और पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट्स में नरवर के कछवाहा (कच्छपघात) शासकों का प्रामाणिक वंशावली विवरण मिलता है।

विस्तृत विवरण:

अक्सर राजा नल को लेकर कई काल्पनिक कहानियां गढ़ी जाती हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में कछवाहा राजपूतों की 'कच्छपघात' शाखा का नरवर पर शासन पूरी तरह प्रमाणित है। 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच नरवर कछवाहा राजाओं का मुख्य गढ़ था। इस वंश के प्रतापी राजा 'गगन सिंह' और 'शरद सिंह' ने नरवर की पहाड़ी पर मजबूत प्राचीर का निर्माण शुरू करवाया था। कछवाहा राजाओं के काल में ही नरवर एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में उभरा, क्योंकि यह उत्तर भारत को दक्षिण से जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग (Trade Route) पर स्थित था।

4. ययाति वंश और कड़ाही की नक्काशी वाले प्राचीन जैन मंदिर

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किले के भीतर खोजे गए जैन प्रतिमाओं के पाद-लेख (Inscriptions) और मूर्तियां, जो वर्तमान में शिवपुरी और ग्वालियर के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

विस्तृत विवरण:

12वीं और 13वीं शताब्दी के दौरान नरवर केवल एक सैन्य किला नहीं, बल्कि कला और धर्म का एक बहुत बड़ा केंद्र था। ययाति वंश और तोमर काल के दौरान यहाँ कई भव्य जैन मंदिरों का निर्माण हुआ। किले के भीतर स्थित जैन मंदिरों के खंडहरों से प्राप्त मूर्तियां यह सिद्ध करती हैं कि यहाँ जैन धर्म के दिगंबर संप्रदाय के बड़े-बड़े मुनियों का चातुर्मास हुआ करता था। यहाँ से मिली कई मूर्तियों पर राजा 'वीरमदेव तोमर' के काल के संवत उत्कीर्ण हैं, जो इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को अकाट्य बनाते हैं।

5. अंचल की जीवनदायिनी: सिंध नदी और मडिखेड़ा का भौगोलिक इतिहास

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: केंद्रीय जल आयोग (CWC) के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स और ब्रिटिश काल के 'सेंट्रल इंडिया गजेटियर' (Central India Gazetteer)

विस्तृत विवरण:

नरवर का भूगोल उसकी सबसे बड़ी ताकत रहा है। सिंध नदी (प्राचीन नाम: सिन्धा) ने सदियों से नरवर को एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच प्रदान किया है। ब्रिटिश काल के कूटनीतिक दस्तावेजों के अनुसार, सिंध नदी के तीव्र बहाव और मानसून के समय इसकी बाढ़ के कारण दुश्मनों के लिए ग्वालियर की तरफ से आकर नरवर पर अचानक हमला करना असंभव होता था। यही कारण है कि सिंधिया काल में भी इस नदी के किनारे कई चौकियां बनाई गईं। आज इसी ऐतिहासिक नदी पर बना 'मडिखेड़ा बांध' (अटल सागर) उसी प्राकृतिक भूगोल का आधुनिक और विकसित स्वरूप है।

6. नरवर का प्रसिद्ध ईसाई कब्रिस्तान और आर्मेनियाई व्यापारी (17वीं-18वीं शताब्दी)

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: किले के नीचे स्थित ऐतिहासिक कब्रिस्तान की कब्रों पर उत्कीर्ण लैटिन, आर्मेनियाई और अंग्रेजी भाषा के शिलालेख

विस्तृत विवरण:

यह नरवर के इतिहास का एक ऐसा अनूठा और प्रामाणिक अध्याय है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मुगल काल के उत्तरार्ध और ब्रिटिश काल की शुरुआत में, नरवर में यूरोपीय और आर्मेनियाई (Armenian) व्यापारियों का एक बड़ा केंद्र था। ये लोग यहाँ मुख्य रूप से कपड़ों के व्यापार, नील की खेती और सैन्य साजो-सामान के सिलसिले में रहते थे। नरवर में मौजूद प्राचीन ईसाई कब्रिस्तान में आज भी 17वीं और 18वीं शताब्दी की कई कब्रें मौजूद हैं, जो यह साबित करती हैं कि नरवर का व्यापारिक संबंध कभी सीधे यूरोप और मध्य-एशिया के देशों से था।

7. राजा जजपाल देव और जजापगैला राजवंश का स्वर्णिम काल (13वीं शताब्दी)

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: नरवर से प्राप्त जजपाल देव के सोने और तांबे के सिक्के तथा 'नरवर शिलालेख'।

विस्तृत विवरण:

दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश (जैसे इल्तुतमिश और बलबन) के समय, मध्य भारत में राजपूतों के पुनरुत्थान का नेतृत्व 'जजापैला' (Jajapella) राजवंश ने किया था। इस वंश के सबसे प्रतापी राजा जजपाल देव ने नरवर को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने दिल्ली के सुल्तानों की सेनाओं को कई बार पराजित कर चंबल और सिंध नदी के पूरे क्षेत्र पर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। उनके द्वारा जारी किए गए सिक्के, जिन पर नागरी लिपि में उनका नाम खुदा है, आज भी पुरातत्वविदों के लिए नरवर की संप्रभुता का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।

8. तोमर राजाओं का काल और 'नरवर की स्थापत्य कला'

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: ग्वालियर और नरवर के महलों की वास्तुकला की तुलनात्मक रिपोर्ट्स तथा 'जफरुल वली' जैसे ऐतिहासिक ग्रंथ।

विस्तृत विवरण:

ग्वालियर के तोमर राजाओं (जैसे मानसिंह तोमर) का नरवर से सीधा संबंध था। नरवर का किला तोमर राजाओं की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति था। इस काल में किले के भीतर जो स्थापत्य कला विकसित हुई, उसमें 'हवा महल', 'कचहरी महल' और जटिल नक्काशीदार खंभे शामिल हैं। इतिहासकारों के अनुसार, नरवर के महलों में अपनाई गई वेंटिलेशन (हवा के आवागमन) की तकनीक और भूमिगत गुप्त रास्ते (टनल) इतने वैज्ञानिक थे कि तीव्र गर्मी के दिनों में भी महल के भीतर का तापमान सामान्य रहता था।

9. सिंधिया राजवंश और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच कूटनीतिक संधि का गवाह

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: वर्ष 1818 और 1844 के 'ट्रीटीज, एंगेजमेंट्स एंड सनड्स' (Treaties, Engagements and Sanads) के आधिकारिक दस्तावेज।

विस्तृत विवरण:


मराठा साम्राज्य के विस्तार के बाद नरवर का किला ग्वालियर के 'सिंधिया राजवंश' के अधीन आया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मध्य भारत में अपने पैर पसार रही थी, तब नरवर का किला कूटनीतिक वार्ताओं का केंद्र बना। अंग्रेजों और सिंधिया राजाओं के बीच हुए समझौतों के तहत नरवर के किले में एक विशेष सैन्य टुकड़ी (Garrison) रखी गई थी, ताकि बुंदेलखंड के विद्रोहियों पर नजर रखी जा सके। इस काल के प्रशासनिक रिकॉर्ड आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) में सुरक्षित हैं।

10. नरवर की ऐतिहासिक टकसाल और सिक्का निर्माण का इतिहास

ऐतिहासिक तथ्य और पुष्टि: प्रसिद्ध मुद्राशास्त्री (Numismatist) की रिपोर्ट्स और ब्रिटिश काल के 'कॉइन्स ऑफ इंडिया' संकलन।

विस्तृत विवरण:

मुगल सम्राट शाहजहाँ और औरंगज़ेब के शासनकाल में नरवर की शाही टकसाल (Royal Mint) को पुनर्जीवित किया गया था। यहाँ ढाले जाने वाले सिक्कों को 'नरवर शाहजहानी' या 'नरवर के सिक्के' कहा जाता था। इन सिक्कों की एक खास पहचान होती थी—इन पर एक विशिष्ट पुदीने का निशान या स्थानीय कूटनीतिक चिह्न अंकित होता था, जिससे बाजार में इनकी शुद्धता की पहचान होती थी। यह तथ्य अकाट्य रूप से प्रमाणित करता है कि वित्तीय और प्रशासनिक रूप से नरवर प्राचीन भारत का एक आत्मनिर्भर और समृद्ध नगर था।

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सोमवार, 8 जून 2026

Story of Dhola and Maru Narwar: ढोला-मारू की अमर प्रेमकथा: नरवर के राजकुमार और मारवाड़ की राजकुमारी की ऐतिहासिक दास्तान, जो आज भी लोक-गीतों में जिंदा है!

Dhola Maru Love Story: जानिए नरवर के राजकुमार ढोला और मारवाड़ की राजकुमारी मारू की ऐतिहासिक व अमर प्रेमकथा। बाल विवाह, विरह, और ऊंट पर सवार होकर नरवर आने की पूरी दास्तान।

नरवर (नरवर समाचार डेस्क)। जब भी इतिहास में अमर प्रेम कहानियों का जिक्र होता है, तो अक्सर लैला-मजनू, हीर-रांझा या रोमियो-जूलियट के नाम विदेशी हवाओं के साथ तैरने लगते हैं। लेकिन हमारे अपने भारतवर्ष और विशेष रूप से नरवर की ऐतिहासिक धरती पर प्रेम की एक ऐसी अनूठी और पावन गाथा लिखी गई, जो विरह की अग्नि में तपकर कुंदन बनी। यह कहानी है—नरवर के राजकुमार ढोला और मारवाड़ (पुंगल) की राजकुमारी मारू की।

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ग्यारहवीं शताब्दी की यह ऐतिहासिक घटना आज भी राजस्थान और मध्य प्रदेश के मालवा-बुंदेलखंड अंचल के लोक-गीतों, 'ढोला' गायन और 'ढोला-मारू रा दूहा' (प्राचीन काव्य) के रूप में गूंजती है। आइए, नरवर दर्शन के इस विशेष लेख में जानते हैं इस अमर प्रेम कहानी का पूरा सच।

🏰 कहानी की शुरुआत: एक भयानक अकाल और बाल विवाह

इस ऐतिहासिक कथा की शुरुआत आज से करीब एक हजार साल पहले होती है। नरवर के प्रताड़ित और प्रतापी राजा नल के पुत्र थे राजकुमार साल्हकुमार, जिन्हें प्यार से सब 'ढोला' पुकारते थे। उसी समय मारवाड़ के पुंगल देश (वर्तमान बीकानेर के पास) में राजा पिंगल का राज था, जिनकी अत्यंत सुंदर पुत्री थीं राजकुमारी मरवण (मारू)

  • अकाल बना निमित्त: एक बार पुंगल देश में भीषण अकाल पड़ा। राहत की तलाश में राजा पिंगल सपरिवार अपने मवेशियों के साथ नरवर अंचल के पास आए। यहाँ राजा नल ने उनका राजसी सत्कार किया।

  • बचपन की शादी: दोनों राजाओं की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि उन्होंने अपने बच्चों का बाल विवाह तय कर दिया। उस समय राजकुमार ढोला की उम्र मात्र 3 वर्ष और राजकुमारी मारू की उम्र केवल 1.5 वर्ष (डेढ़ साल) थी। शादी के बाद पुंगल में अकाल समाप्त हुआ और राजा पिंगल अपनी पुत्री मारू को लेकर वापस मारवाड़ लौट गए।

💔 विरह का दौर और ढोला की दूसरी शादी

समय बीतने के साथ दोनों बच्चे बड़े हुए। इसी बीच नरवर के राजा नल की मृत्यु हो गई और ढोला (साल्हकुमार) ने कम उम्र में ही नरवर का राजपाठ संभाल लिया। बाल विवाह होने के कारण ढोला अपनी पहली शादी के बारे में पूरी तरह भूल चुके थे।

इधर, ढोला के बड़े होने पर उनके परिजनों ने उनका दूसरा विवाह मालवा की राजकुमारी 'मालवणी' से कर दिया। मालवणी स्वभाव से बेहद ईर्ष्यालु और तीक्ष्ण बुद्धि की थीं। जब मालवणी को पता चला कि ढोला का बचपन में एक विवाह मारवाड़ की राजकुमारी मारू से भी हो चुका है, तो उसने कड़ा पहरा बिठा दिया। उसने नरवर की सीमाओं पर सख्त आदेश दे दिए कि मारवाड़ की तरफ से आने वाले किसी भी संदेशवाहक या डाकिए को राजा ढोला से न मिलने दिया जाए और उन्हें रास्ते में ही मार दिया जाए।

🐫 राजकुमारी मारू का विरह और 'ढोला-मारू रा दूहा'

उधर मारवाड़ (पुंगल) में राजकुमारी मारू यौवन की दहलीज पर कदम रख चुकी थीं। वह बेहद खूबसूरत थीं और सपने में अक्सर अपने पति ढोला को देखती थीं। जब राजा पिंगल ने नरवर कई संदेशवाहक भेजे और कोई वापस नहीं लौटा, तो मारू विरह (Judseparation) के दर्द से तड़प उठीं। उसने अपनी व्यथा को दोहों में पिरोया, जिसे आज राजस्थानी साहित्य में 'ढोला-मारू रा दूहा' कहा जाता है:

"ढोला मारू री बातड़ी, सुणता ही दुख जाइ।

गूंथ्या मुक्तां री लड़ी, हियै हरख ना माइ॥"

        सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवणरी बात।

        जोवन छाई धण भली, तारांछाई रात।। 

ढाढ़ियों (गायक कलाकारों) की चतुराई:

जब कोई सीधा रास्ता नहीं बचा, तो पुंगल के राजा ने चतुर गाडियों/ढाढ़ियों (लोक गायकों) के एक समूह को भेष बदलकर नरवर भेजा। ये गायक नरवर पहुंचे और रिमझिम बारिश की एक रात उन्होंने राजा ढोला के महल के नीचे बैठकर मल्हार राग में राजकुमारी मारू के रूप, उसके विरह और बचपन के विवाह की कहानी को गाकर सुनाना शुरू किया।

गायन में मारू का दर्द और शादी का जिक्र सुनकर ढोला की पुरानी यादें ताजा हो गईं और उन्हें सब कुछ याद आ गया।

⚔️ बाधाएं और ऊंट पर सवार होकर 'नरवर' आगमन

सच्चाई जानने के बाद राजा ढोला अपनी पहली पत्नी मारू को लाने के लिए व्याकुल हो उठे। दूसरी पत्नी मालवणी ने उन्हें रोकने के बहुत जतन किए, लेकिन ढोला एक बेहद फुर्तीले और जादुई ऊंट पर सवार होकर रातों-रात मारवाड़ के लिए निकल पड़े।

पुंगल पहुंचकर ढोला और मारू का पुनर्मिलन हुआ। जब ढोला अपनी सुंदर दुल्हन मारू को ऊंट पर आगे बिठाकर वापस नरवर लौट रहे थे, तो रास्ते में मालवा के एक और ईर्ष्यालु राजा 'उमर सूमरा' ने ढोला को मारकर मारू को हासिल करने की साजिश रची। लेकिन मारू की बुद्धिमानी और ढोला के शौर्य के आगे दुश्मन टिक नहीं सके। वे दोनों सुरक्षित रूप से विंध्याचल की पहाड़ियों को पार कर अपने महल 'नरवर किले' वापस लौट आए।

नरवर पहुंचने पर रानी मालवणी ने भी मारू के दिव्य रूप और व्यवहार को देखकर अपनी कड़वाहट छोड़ दी और दोनों रानियां राजा ढोला के साथ सुखपूर्वक नरवर में रहने लगीं।

🎨 ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व (Historical Legacy)

  • चित्रकला का केंद्र: ढोला-मारू की यह कहानी राजपूत चित्रकला (Rajput Paintings) और विशेषकर मारवाड़ व मेवाड़ स्कूल ऑफ आर्ट्स का सबसे पसंदीदा विषय रही है। आज भी देश-विदेश के संग्रहालयों में ऊंट पर सवार ढोला-मारू के प्राचीन चित्र सहेज कर रखे गए हैं।

  • पर्यटन के लिए संदेश: हमारे नरवर के किले की प्राचीरें, पुरानी कचहरी और महल आज भी गवाही देते हैं कि यह भूमि सिर्फ शूरवीरों की नहीं, बल्कि अमर प्रेमियों की भी रही है।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

ढोला-मारू की प्रेमकथा हमें सिखाती है कि यदि प्रेम में पवित्रता और विश्वास हो, तो सैकड़ों मील की दूरियां, समय का लंबा अंतराल और दुश्मनों की साजिशें भी दो प्रेम करने वालों को अलग नहीं कर सकतीं। ऐतिहासिक नगरी नरवर के गौरव को वैश्विक पटल पर लाने के लिए हमें अपनी इन समृद्ध लोक-कथाओं और इतिहास को संजोकर रखना होगा।


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रविवार, 24 मई 2026

MP Atithi Shikshak 2026-27: अतिथि शिक्षकों के लिए बड़ी खुशखबरी! प्रोफाइल अपडेट, अनुभव क्लेम और डबल आईडी मर्ज की प्रक्रिया शुरू, जानें आखिरी तारीख!

नमस्कार दोस्तों, 'नरवर दर्शन' (Narwar Darshan) ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

​मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में अतिथि शिक्षक (Guest Teacher) के रूप में कार्य कर रहे और भविष्य में कार्य करने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) की ओर से एक बेहद महत्वपूर्ण अपडेट सामने आया है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए GFMS (Guest Faculty Management System) पोर्टल को एक बार फिर से एक्टिव कर दिया गया है।

​यदि आप भी इस सत्र में अपनी सेवाएं देना चाहते हैं, तो विभाग द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइंस और महत्वपूर्ण तारीखों को बिल्कुल भी मिस न करें। आइए जानते हैं इस बार पोर्टल पर क्या-क्या नए बदलाव और सुविधाएं दी गई हैं।

​📅 सबसे महत्वपूर्ण तारीख: समय बहुत कम है!

​विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, पोर्टल पर सभी जरूरी प्रक्रियाएं 22 मई 2026 से शुरू हो चुकी हैं और इसकी अंतिम तिथि 28 मई 2026 निर्धारित की गई है। समय सीमा बहुत कम है, इसलिए अंतिम तारीख का इंतजार किए बिना अपनी प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी कर लें।

​🛠️ पोर्टल पर क्या-क्या काम होने हैं? (मुख्य बिंदु)

​इस बार पोर्टल पर उम्मीदवारों की सहूलियत के लिए कई बड़े विकल्प दिए गए हैं:

  1. प्रोफाइल अपडेट (Profile Update): यदि आपकी शैक्षणिक योग्यता (Qualification) में कोई बढ़ोतरी हुई है (जैसे आपने हाल ही में B.Ed, M.A. या कोई अन्य डिग्री पूरी की है), तो आप उसे अपनी प्रोफाइल में अपडेट कर सकते हैं।
  2. प्रोफाइल लॉक (Profile Lock): सभी जानकारियों को सही-सही भरने के बाद अपनी प्रोफाइल को लॉक करना अनिवार्य है। बिना लॉक किए आपकी प्रोफाइल आगे की प्रक्रिया के लिए मान्य नहीं होगी।
  3. नया पंजीयन और सत्यापन (Registration & Verification): नए आवेदक पोर्टल पर नया रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं और पुराने आवेदक अपनी जानकारी को सत्यापित कर सकते हैं।
  4. अनुभव क्लेम अपडेट (Experience Claim Update): पिछले सत्रों में किए गए कार्य का अनुभव प्रमाण पत्र (Experience Certificate) पोर्टल पर क्लेम करने का यह आखिरी मौका है, जिससे आपको मेरिट में प्राथमिकता मिल सके।
  5. डबल आईडी मर्ज सुविधा (Double ID Merge Facility - विशेष): इस बार विभाग ने उन अतिथि शिक्षकों को बड़ी राहत दी है जिनकी तकनीकी कारणों से या अलग-अलग समय पर दो यूजर आईडी बन गई थीं। अब आप 'डबल आईडी मर्ज सुविधा' का उपयोग करके दोनों आईडी को एक साथ जोड़ सकते हैं ताकि आपका अनुभव और डाटा सुरक्षित रहे।

​🧑‍🏫 संकुल प्राचार्य से सत्यापन (Verification) है अनिवार्य!

​पोर्टल पर ऑनलाइन फॉर्म भरने, प्रोफाइल अपडेट करने या अनुभव क्लेम दर्ज करने के बाद आपकी प्रक्रिया पूरी नहीं होती है।

  • ​ऑनलाइन पावती (Receipt) का प्रिंट आउट लेकर आपको अपने नजदीकी संकुल प्राचार्य (Sankul Principal) के पास जाना होगा।
  • ​वहां अपने सभी मूल दस्तावेजों (Original Documents) का मिलान करवाकर सत्यापन (Verification) अवश्य कराएं।
  • ​जब तक संकुल प्राचार्य अपनी आईडी से आपकी प्रोफाइल को वेरिफाई नहीं करेंगे, तब तक आपका आवेदन सत्र 2026-27 की भर्ती प्रक्रिया के लिए पात्र नहीं माना जाएगा।

​💡 आवेदकों के लिए 'नरवर दर्शन' की सलाह:

  • ​फॉर्म भरते समय अपने मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी को चालू स्थिति में रखें।
  • ​डबल आईडी मर्ज करते समय सावधानी बरतें और केवल अपनी ही वैध आईडी को मर्ज करें।
  • ​संकुल में सत्यापन कराते समय प्राचार्य द्वारा दी जाने वाली सत्यापित पावती को संभालकर रखें।

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(नोट: अधिक तकनीकी जानकारी या किसी भी समस्या के समाधान के लिए उम्मीदवार आधिकारिक GFMS पोर्टल पर जा सकते हैं या अपने संकुल केंद्र से संपर्क कर सकते हैं।)


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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

नरवर में दो पर्यटन मित्रों की नियुक्ति: पर्यटन को मिलेगी उड़ान, इसे बढ़ावा देने के लिए मिले 2 पर्यटन मित्र

नरवर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का पूरी ऐतिहासिक तथ्यात्मक जानकारी के साथ भ्रमण कराने के लिए जिला पुरातत्व, पर्यटन एवं संस्कृति परिषद DATCC Shivpuri की ओर से जिला शिवपुरी कलेक्टर श्री अक्षय कुमार सिंह जी द्वारा द्वारा नरवर में दो पर्यटन मित्रों शिवम सिंह परमार और दीपक सिंह परिहार की नियुक्ति की है।

नरवर में नियुक्त हुए दो पर्यटन मित्र Shivam Singh Parmar और Deepak Singh Parihar

नरवर क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने व लोगों को यहां के गौरवशाली इतिहास व धार्मिक महत्व सहित प्राकृतिक सौंदर्य से परिचय कराने के लिए कलेक्टर अक्षय कुमार सिंह ने दो पर्यटन मित्रों की नियुक्ति की है। नरवर क्षेत्र में नियुक्त किए गए पर्यटन मित्रों से अब क्षेत्र में पर्यटन को उड़ान मिलेगी और दूरदराज से आने वाले सैलानियों को नरवर किले, मडीखेड़ा व मोहनी सागर डेम सहित लोढीमाता मंदिर का भ्रमण कर यहां के इतिहास की जानकारी हासिल होगी। कलेक्टर अक्षय कुमार सिंह ने सांसद विवेक शेजवलकर की अनुशंसा पर यह पर्यटन मित्र नियुक्त किए हैं । इसमें शिवम परमार व दीपक सिंह परिहार को डीएटीसी शिवपुरी द्वारा टूरिस्ट गाइड के रूप में चयनित किया गया है।

नल-दमयंती की प्रतिमा के लिए सांसद ने दिए 25 लाख : लेखक धीरज गुप्ता की पुस्तक के विमोचन अवसर पर ग्वालियर सांसद विवेक शेजवलकर ने नरवर क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुए नल दमयंती की प्रतिमा स्थापित करने के लिए 50 लाख रुपए की राशि दिए जाने की बात कही थी। इस राशि की पहली किस्त 25 लाख रुपए जारी कर दी गई है, इससे अब नरवर में प्रतिमा स्थापित होने का कार्य जल्द शुरू होगा। सांसद के प्रयासों से नरवर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन मित्रों की नियुक्ति पर नगर परिषद अध्यक्ष पदमा-संदीप माहेश्वरी, सौरभ गौड़, देवेंद्र शर्मा, पवन सिंह बैश, विशाल चौरसिया,  व सभी पर्यटन प्रेमियों द्वारा खुशी जाहिर की गई है।

लेखक व साहित्यकार ने की सांसद थी टूरिस्ट गाइड की मांग:
इतिहास विरासत और प्रकृति का संगम नरवर पुस्तक के लेखक धीरज गुप्ता ने ग्वालियर सांसद विवेक शेजवलकर से बैठकर क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने और यहां के गौरवशाली इतिहास, धार्मिक महत्व एवं असीम प्राकृतिक सौंदर्य को लोगों के बीच प्रस्तुत करने के लिए टूरिस्ट गाइड नियुक्त करने के लिए आग्रह किया था। इस संबंध में सांसद शेजवलकर द्वारा कलेक्टर अक्षय कुमार सिंह से चर्चा की गई। इस पर कलेक्टर अक्षय सिंह द्वारा डीएटीसीसी शिवपुरी के माध्यम से नरवर व आसपास के पर्यटन स्थलों की जानकारी देने के लिए दो पर्यटन मित्र नियुक्त करने के निर्देश दिए। इस पर डीएटीसीसी डिप्टी कलेक्टर शिवांगी अग्रवाल द्वारा सक्रिय सदस्य अरविंद, सौरभ गौड, विशाल चौरसिया तथा धीरज गुप्ता से चर्चा कर पर्यटन मित्रों की नियुक्ति कर दी गई।

कलेक्टर बोले- पर्यटन मित्रों को ओरछा में मिलेगी ट्रेनिंग
कलेक्टर अक्षय कुमार सिंह के मुताबिक नरवर क्षेत्र में पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए नियुक्त किए गए पर्यटन मित्रों को ट्रेनिंग के लिए ओरछा व कूनो भेजा जाएगा। इसके साथ ही डीएटीसी की वेबसाइट, सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से पर्यटन मित्रों के नाम एवं नंबर प्रसारित किए जाएंगे। इससे जो भी पर्यटक नरवर आएगा, वह नरवर के गौरवशाली इतिहास धार्मिक महत्व व नरवर किले पर बनी अभिनेता रजनीकांत, जीनत अमान व राकेश रोशन की नरवर क्षेत्र में ही फिल्माई गई मूवी डाकू हसीना के संबंध में जानकारी मिल सकेगी।
(साभारः दैनिक भास्कर)

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सोमवार, 30 मई 2022

नरवर जनपद पंचायत के वार्ड और उनमें सम्मिलित ग्राम पंचायतों की जानकारी तथा वार्डों का आरक्षण

जनपद पंचायत नरवर के वार्ड और उनके अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों की सूची तथा वार्डों के आरक्षण की स्थिति

(मध्यप्रदेश त्रि-स्तरीय पंचायत निर्वाचन की सम्पूर्ण जानकारी के साथ)

MP Panchayat Election 2022 : मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने शुक्रवार दिनांक 27-05-2022 को पत्र क्रमांक एफ-37/PN-01/2022/तीन/211 द्वारा मध्य प्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायत निर्वाचन कराये जाने हेतु कार्यक्रम जारी कर दिया है। चुनाव कार्यक्रम जारी होने के साथ ही प्रदेश भर में आदर्श आचार संहिता लागू हो गयी है। निर्वाचन कार्यक्रम में उल्लिखित तिथियों के अनुसार -


सोमवार दिनांक 30-05-2022 से सोमवार दिनांक 06-06-2022 तक नामनिर्देशन पत्र जमा करना निर्धारित किया गया है। नामनिर्देशन पत्र (नामांकन फॉर्म) प्रातः 10.30 बजे से अपरान्ह 3.00 बजे तक जमा कराए जा सकते हैं।

मंगलवार दिनांक 07-06-2022 को अंतिम तिथि 06 जून तक जमा हुए नामांकन पत्रों की संवीक्षा यानि जाँच की जाएगी। जिसमें त्रुटिपूर्ण आवेदनों पर कार्यवाही करते हुए नामनिर्देशन पत्रों की छँटनी की जाएगी तथा अपूर्ण अथवा त्रुटिपूर्ण आवेदनों को निरस्त एवं निर्वाचन के नियमानुसार उपयुक्त नामनिर्देशन पत्रों को स्वीकृत करने की कार्यवाही की जाएगी।

शुक्रवार दिनांक 10-06-2022 को सांय 3.00 बजे तक नाम वापिसी की कार्यवाही की जाएगी। जिसमें अभ्यर्थिता से नाम वापिस लेने के इच्छुक प्रत्याशी निर्धारित प्रारूप आर ओ (रिटर्निंग ऑफिसर) के पास जमा कर नाम वापिस ले सकते हैं।

शुक्रवार दिनांक 10-06-2022 को ही नाम वापिसी के ठीक बाद यानि 3.00 बजे के बाद निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों (प्रत्याशियों) की फाईनल सूची तैयार की जाएगी तथा सूची तैयार होने के बाद निर्वाचन के नियमानुसार अभ्यर्थियों को चुनाव चिन्ह (प्रतीक चिह्न) आवंटित किये जाएँगे।

उपरोक्त सभी प्रक्रियाएँ पूर्ण होने के पश्चात बारी आती है सबसे महत्वपूर्ण तिथि की। जी हाँ, वह तारीख जिस दिन प्रत्याशियों की किस्मत मतपेटी में बन्द होगी। मतदान की तारीख चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण तारीख मानी जाती है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव - 2022 के कार्यक्रम में सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में 3 चरणों में मतदान कराए जाने की तिथियाँ निर्धारित की हैं, जो इस प्रकार हैं -

प्रथम चरण मतदान - शनिवार दिनांक 25-06-2022
द्वितीय चरण मतदान - शुक्रवार दिनांक 01-07-2022
तृतीय चरण मतदान - शुक्रवार दिनांक 08-07-2022

मध्यप्रदेश निर्वाचन आयोग द्वारा मतदान का समय प्रातः 07 बजे से अपरान्ह 03.00 तक का निर्धारित किया गया है जो कि एक नया समय है। इससे पूर्व हुए मतदानों में यह समय सांंय 5 बजे तथा 6 बजे तक भी रहा है।

गुरुवार दिनांक 14-07-2022 को पंच, सरंपच तथा जनपद पंचायत सदस्य पद की मतगणना की जाएगी तथा फाईनल मतगणना होने के बाद निर्वाचन परिणाम घोषित किये जाएँगे। इसी तारीख को मतपेटियों में कैद सभी प्रत्याशियों की किस्मत खुलेगी और जीत हार का फैसला होगा।

यह तो हुई नामनिर्देशन पत्र जमा करने की तिथि से लेकर मतगणना और चुनाव परिणाम घोषित होने तक के कार्यक्रम की बात। अब बात करते हैं मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की नरवर जनपद पंचायत के वार्डों के आरक्षण की स्थिति और वार्डों में सम्मिलित ग्राम पंचायतों के बारे में -

जनपद पंचायत नरवर में कुल 21 वार्ड हैं जिनमें नरवर तहसील की कुल 61 ग्राम पंचायतें समाहित हैं।

वार्ड क्रमांक 01 - जनपद पंचायत नरवर का वार्ड क्रमांक 01 अनारक्षित (मुक्त) है, यानि इस वार्ड से किसी भी वर्ग का महिला अथवा पुरुष अभ्यर्थी निर्वाचन हेतु नामनिर्देशन पत्र दाखिल कर सकता है। इस वार्ड में कुल तीन ग्राम पंचायतें बरखाडी, बीलोनी और साबोली शामिल हैं



वार्ड क्रमांक 02 - जनपद पंचायत नरवर का वार्ड क्रमांक 02 अनारक्षित (महिला) है, यानि इस वार्ड से किसी भी वर्ग से केवल महिला अभ्यर्थी निर्वाचन हेतु नामनिर्देशन पत्र दाखिल कर सकती हैं। इस वार्ड में कुल तीन ग्राम पंचायतें कठेंगरा, चकरामपुर और भीमपुर शामिल हैं

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वार्ड क्रमांक 03 - जनपद पंचायत नरवर का वार्ड क्रमांक 01 अनारक्षित (महिला) है, यानि इस वार्ड से किसी भी वर्ग से केवल महिला अभ्यर्थी निर्वाचन हेतु नामनिर्देशन पत्र दाखिल कर सकती हैं। इस वार्ड में कुल पाँच ग्राम पंचायतें कांकर, ख्यावदा, ठाटी, देवरीखुर्द और पीपलखाडी शामिल हैं

रविवार, 26 अप्रैल 2020

An Interesting story of Nal-Damayanti's Swayamvara | नल-दमयंती के स्वयंवर की रोचक कथा।


निषध नरेश राजा नल और दमयन्ती की स्वयंवर कथा

फोटो स्टोरी यहाँ पढिए - नल-दमयंती कथा



एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा। उन्होंने एक हंस को पकड़ लिया। हंस ने कहा—‘आप मुझे छोड़ दीजिये तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य वर लेगी।’ नल ने हंसको छोड़ दिया। वे सब उड़कर विदर्भ देश में गये। दमयन्ती अपने हंसों को देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसों को पकड़ने के लिये उनकी ओर दौड़ने लगी। दमयन्ती जिस हंस को पकड़ने के लिये दौड़तीवही बोल उठता कि अरी दमयन्ती ! निषाद देश में एक नल नाम का राजा है। वह अश्विनीकुमार के समान सुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुन्दर और कोई नहीं है। वह मानो मूर्तिमान् कामदेव है। यदि तुम उसकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जायँ। हम लोगों ने देवतागंधर्वमनुष्यसर्प और राक्षसों को घूम-घूमकर देखा है नल के समान कहीं सुन्दर पुरुष देखने में नहीं आया। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न होवैसे ही नल पुरुषों में भूषण है। तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी।’ दमयन्ती ने कहा—‘हंस ! तुम नल से भी ऐसी बात कहना।’ हंस ने निषाद देश में लौटकर नल से दमयन्ती का संदेश कह दिया।

दमयन्ती हंस के मुँह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी। उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गयी कि वह रात-दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वह दीन-सी दीखने लगी। सखियों ने दमयन्ती के हृदय का भाव ताड़कर विदर्भराज से निवेदन किया कि आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गयी है।’ राजा भीम ने अपनी पुत्री के सम्बन्ध में बड़ा विचार किया। अन्त में वह इस निर्णय पर पहुँचे कि मेरी पुत्री विवाहयोग्य हो गयी हैइसलिये इसका स्वयंवर कर देना चाहिये। उन्होंने सब राजाओं को स्वयंवर का निमन्त्रण-पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया कि राजाओं को दमयन्ती के स्वयंवर में पधारकर लाभ उठाना चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये। देश-देश के नरपति हाथीघोड़े और रथों की ध्वनि से पृथ्वी को मुखरित करते हुए सज-धजकर विदर्भ देश में पहुँचने लगे। भीम ने सबके स्वागत सत्कार की समुचित व्यवस्था की।

देवर्षि नारद और पर्वत के द्वारा देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया। इन्द्र आदि सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनों सहित विदर्भ देश के लिये रवाना हुए। राजा नल का चित्त पहले से ही दमयन्ती पर आसक्त हो चुका था। उन्होंने भी दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिये विदर्भ देश की यात्रा की। देवताओं ने स्वर्ग से उतरते समय देख लिया कि कामदेव के समान सुन्दर नल दमयन्ती के स्वयंवर के लिये जा रहे हैं। नल की सूर्य के समान कान्ति और लोकोत्तर रूप-सम्पत्ति से देवता भी चकित हो गये। उन्होंने पहिचान लिया कि ये नल हैं। उन्होंने अपने विमानों को आकाश में खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर नल से कहा—‘राजेन्द्र नल ! आप बड़े सत्यव्रती हैं। आप हम लोगों की सहायता करने के लिए दूत बन जाइये।’ नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि करूँगा। फिर पूछा कि आप लोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर कौन-सा काम लेना चाहते हैं ?’ इन्द्र ने कहा—‘हमलोग देवता हैं। मैं इन्द्र हूँ और ये अग्निवरुण और यम हैं। हम लोग दमयन्ती के लिये यहाँ आये हैं।
देवताओं ने नल से कहा कि आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और कहिए कि इन्द्रवरुणअग्नि और यमदेवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमें से तुम चाहे जिस देवता को पति के रूप में स्वीकार कर लो।’ नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि देवराज’ ! वहाँ आप लोगों के और मेरे जाने का एक ही प्रयोजन है। इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजेंयह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी होवह भलाउसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है ? आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा कीजिये

दमयन्ती का स्वयंवर और विवाह

दमयन्ती का स्वयंवर हुआ जिसमें न केवल धरती के राजाबल्कि देवता भी नल का रूप धरकर आ गए। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी परेशान थे कि असली नल कौन होगा। लेकिन दमयन्ती जरा भी विचलित नहीं हुई। उसने आंखों से ही असली नल को पहचान लिया। सारे देवताओं ने भी उनका अभिवादन किया। इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवनसाथी चुन लिया। नव-दम्पत्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषाद-नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे।
दमयन्ती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था। समयानुसार दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और गुणसे सम्पन्न थे। समय सदा एक-सा नहीं रहतादुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे तो महाराज नल गुणवान्धर्मात्मा तथा पुण्यश्लोक थेकिन्तु उनमें एक दोष था जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगेसोनाचाँदीरथराजपाट सब हाथ से निकल गया। महारानी दमयन्ती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया।

इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया। एक दिन राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचायदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये। अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचादमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिताके पास पहुँच जायगी।

यह विचारकर उन्होंने तलवार से उसकी आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये। जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अचानक अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा। दमयन्ती की चीख सुनकर एक व्याध ने उसे अजगर का ग्रास होने से बचाया। किंतु व्याध स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा। दमयन्ती उसे शाप देते हुए बोली—‘यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का कभी चिन्तन न किया हो तो इस पापी व्याध के जीवन का अभी अन्त हो जाय। दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध मृत्यु को प्राप्त हुआ।
दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास और उसके बाद अपने पिता के पास पहुँच गयी। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया।

(साभार - विकिपीडिया)

यहाँ देखिए, नरवर कैसे पहुँचें - How To Reach Narwar


रविवार, 19 अप्रैल 2020

नरवर दुर्ग : इंग्लैण्ड के पुरातत्वेत्ता Kevin Standage की नज़र से। (An Article in English)




राजा नल-दमयंती की अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी नरवर के बारे में यूँ तो महाभारत और श्रीहर्ष रचित नैषिधीयचरितम् आदि पुरातन ग्रंथों में नलपुर और निषधदेश नाम से उल्लेख मिलता है। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के शोथ में ए. कनिंघम के द्वारा भी नरवर दुर्ग पर विस्तृत विवरण दिया गया है। आज हम नरवर दर्शन पर आपके लिए लेकर आए हैं अभी हाल ही में नरवर किले के भ्रमण पर आये इंग्लैण्ड के पुरातत्वेत्ता केविन स्टैंडेज (Kevin Standage) के द्वारा लिखा गया एक बेहतरीन आलेख। इसे पढिए और नरवर के ऐतिहासिक वैभव से आत्मसात होइए ...

पिसनहारी दरवाजे के ऊपर का रास्ता

Perched on top of an irregular hill 500 feet above the town, Narwar Fort is 70 km south-west of Gwalior in the Shivpuri district of Madhya Pradesh. I have struggled to find much information regarding this fort, so almost all the information here will come from the Archaeological Survey of India Volume II 1864-65 by Alexander Cunningham. Clearly Narwar Fort is not visited very frequently if I’m having to rely on a document that is 155 years old 
🙂


The history of Narwar seems to extend back a very long time, all the way to mythology in fact. Traditionally said to have been the capital of Raja Nala from the Sanskrit epic Mahabharata, the town below the fort was called Nalapura until the 12th century.

नरवर किले का दृश्य



The history of Narwar seems to extend back a very long time, all the way to mythology in fact. Traditionally said to have been the capital of Raja Nala from the Sanskrit epic Mahabharata, the town below the fort was called Nalapura until the 12th century.





Archaeological evidence would seem to suggest that Narwar was ruled by the Naga rulers from 0 AD to 225 AD under a succession of nine Naga kings. Curiously, for the next eight centuries the archaeological record falls silent with no coins or inscriptions found in the area, although an inscription discovered at Eran may suggest that the region was ruled by the Toramana dynasty.



Exactly how long the Toramana dynasty lasted is not known either, but we do know that from the 12th century onwards Narwar was held successively by Kachwaha, Parihar, and Tomar Rajputs (warrior caste) until its capture by the Mughals in the early 16th century. It was subsequently conquered by the Maratha Maharaja Scindia in the 19th century.


Access to Narwar Fort is from the east, you can clearly see the pathway on Google maps leaving the town and heading north before taking a sharp left just by Alamgir Gate, previously known as Pisanhari Gate and rebuilt in the Moghul style by Aurangzeb.

                                                                                      

The climb is quite steep, initially just an incline but eventually becoming steps, be sure to have plenty of water with you The original door of the second gate, Saiyidon Ka Darwaza (seen above), is still in situ although now in a state of disrepair.



There are no remains from the Hindu period at Narwar Fort except for a handful of inscriptions, none of which I found or even knew about prior to my visit. All the Hindu structures were obliterated by Sikandar Lodhi in 1508 AD. Ferishta records that Sikandar’s men remained at the fort for six months tearing down temples and building mosques and other structures.





We can still see evidence of that event today. One of the few buildings I was able to identify, the Chhip Mahal, clearly has carved pillars that have been reused from a circa 11th century Hindu temple.



The Chhip Mahal, with reused carved pillars probably from a Hindu temple



It’s fortunate that Gwalior Fort did not see the same fate otherwise we may have lost the likes of Sas Bahu and Teli Ka Mandir. Sikander Lodhi was planning to lay siege to Gwalior Fort, but he died during the initial planning stages in 1517.


So what remains today are Moghul structures, but their number and magnificence would seem to indicate that at its zenith of Mughal occupation, Narwar Fort was second only to Gwalior Fort.




The circumference of the fort is nearly 5 miles, if you want to see everything inside it could take the best part of a day. In all likelihood you will be the only tourist here, on my visit I had the fort completely to myself to explore aside from a few locals who had walked up the hill for some exercise.





In some respects this fort is similar to Gohad Fort that I had visited a few days earlier, although here everything is on a much larger scale and the state of preservation is a significantly better in places.




Some work does seem to have occurred in recent years to make the fort more accessible and safe to visit. The eastern side of the fort which visitors will reach first is very well preserved and maintained.




Here you’re free to explore what can be at times a maze of tracks and alleyways taking you many interesting buildings, with courtyards and colonnaded arcades everywhere you turn. It’s a really enjoyable experience and fun just to follow your nose, satisfy your curiosity, get a little lost in the process.




The western side of the fort is in stark contrast to the east, here the structures have (for now) been left to crumble and access to many of them is almost impossible due to the vegetation (and slight concern about snakes quite honestly!).



I started wondering how the fort had got into this current situation, with half of it very accessible, conserved, safe, and quite well managed but the other half appearing as those nothing has happened for the last 50 years.


Did the authorities run out of funds ? Am I just seeing a project that is on-going and will be completed at some point ? Or is there another explanation ? If anyone can shed any light on this I would be really interested to hear from you.




I was unable to identify most of the buildings inside Narwar Fort, as there was no site map anywhere to be seen. Since returning home I’ve been unable to find anything online either.
The structures that are here are recorded as; Hawa Paur Mahal, Koriyon ki Haveli, Ladau Bangla, Chhip Mahal, Flour Mill or Chakki Mahal, Phulwa Mahal, Rani Damyanti Mahal, Rawa Parewa Mahal, Kachheri Mahal, Sunheri Mahal, Ram Janaki Temple, Catholic Chapel and Sikander Lodhi Mosque.
It would be great if anyone can help associate the building names to the photographs, just so I have Narwar Fort better documented.
Father Monserrate, a Jesuit priest from Portugal who passed through Narwar on his way to meet Akbar in 1580, describes Narwar:
“This district is called after the neighbouring town; its savage inhabitants knowing that they can commit robberies with impunity, are wont to attack travellers from ambush and to carry off their goods as plunder.”







You’ll be glad to hear that Narwar has greatly improved over the intervening centuries. I left Narwar Fort feeling that I had discovered a bit of a secret in Madhya Pradesh, in much the same way as I felt at Gohad Fort a few days previously, and also last year at Datia Palace.



This place seems to be completely off the tourist radar and yet some investment has clearly taken place to make the visiting experience a more memorable one.
I can only hope that in the future efforts are made to promote Narwar Fort a little more, it has immense potential and I can easily see this being a great day excursion from Gwalior for both foreign and local Indian tourists.

:: साभार ::

केविन स्टैंडेज
पुरातत्वेत्ता एवं फोटोग्राफर
ग्रेट मिसेनडेन, इंग्लैण्ड
वर्ष : 2019

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