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सोमवार, 8 जून 2026

Story of Dhola and Maru Narwar: ढोला-मारू की अमर प्रेमकथा: नरवर के राजकुमार और मारवाड़ की राजकुमारी की ऐतिहासिक दास्तान, जो आज भी लोक-गीतों में जिंदा है!

Dhola Maru Love Story: जानिए नरवर के राजकुमार ढोला और मारवाड़ की राजकुमारी मारू की ऐतिहासिक व अमर प्रेमकथा। बाल विवाह, विरह, और ऊंट पर सवार होकर नरवर आने की पूरी दास्तान।

नरवर (नरवर समाचार डेस्क)। जब भी इतिहास में अमर प्रेम कहानियों का जिक्र होता है, तो अक्सर लैला-मजनू, हीर-रांझा या रोमियो-जूलियट के नाम विदेशी हवाओं के साथ तैरने लगते हैं। लेकिन हमारे अपने भारतवर्ष और विशेष रूप से नरवर की ऐतिहासिक धरती पर प्रेम की एक ऐसी अनूठी और पावन गाथा लिखी गई, जो विरह की अग्नि में तपकर कुंदन बनी। यह कहानी है—नरवर के राजकुमार ढोला और मारवाड़ (पुंगल) की राजकुमारी मारू की।

Dhola Maru Real Love Story Narwar Fort History

ग्यारहवीं शताब्दी की यह ऐतिहासिक घटना आज भी राजस्थान और मध्य प्रदेश के मालवा-बुंदेलखंड अंचल के लोक-गीतों, 'ढोला' गायन और 'ढोला-मारू रा दूहा' (प्राचीन काव्य) के रूप में गूंजती है। आइए, नरवर दर्शन के इस विशेष लेख में जानते हैं इस अमर प्रेम कहानी का पूरा सच।

🏰 कहानी की शुरुआत: एक भयानक अकाल और बाल विवाह

इस ऐतिहासिक कथा की शुरुआत आज से करीब एक हजार साल पहले होती है। नरवर के प्रताड़ित और प्रतापी राजा नल के पुत्र थे राजकुमार साल्हकुमार, जिन्हें प्यार से सब 'ढोला' पुकारते थे। उसी समय मारवाड़ के पुंगल देश (वर्तमान बीकानेर के पास) में राजा पिंगल का राज था, जिनकी अत्यंत सुंदर पुत्री थीं राजकुमारी मरवण (मारू)

  • अकाल बना निमित्त: एक बार पुंगल देश में भीषण अकाल पड़ा। राहत की तलाश में राजा पिंगल सपरिवार अपने मवेशियों के साथ नरवर अंचल के पास आए। यहाँ राजा नल ने उनका राजसी सत्कार किया।

  • बचपन की शादी: दोनों राजाओं की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि उन्होंने अपने बच्चों का बाल विवाह तय कर दिया। उस समय राजकुमार ढोला की उम्र मात्र 3 वर्ष और राजकुमारी मारू की उम्र केवल 1.5 वर्ष (डेढ़ साल) थी। शादी के बाद पुंगल में अकाल समाप्त हुआ और राजा पिंगल अपनी पुत्री मारू को लेकर वापस मारवाड़ लौट गए।

💔 विरह का दौर और ढोला की दूसरी शादी

समय बीतने के साथ दोनों बच्चे बड़े हुए। इसी बीच नरवर के राजा नल की मृत्यु हो गई और ढोला (साल्हकुमार) ने कम उम्र में ही नरवर का राजपाठ संभाल लिया। बाल विवाह होने के कारण ढोला अपनी पहली शादी के बारे में पूरी तरह भूल चुके थे।

इधर, ढोला के बड़े होने पर उनके परिजनों ने उनका दूसरा विवाह मालवा की राजकुमारी 'मालवणी' से कर दिया। मालवणी स्वभाव से बेहद ईर्ष्यालु और तीक्ष्ण बुद्धि की थीं। जब मालवणी को पता चला कि ढोला का बचपन में एक विवाह मारवाड़ की राजकुमारी मारू से भी हो चुका है, तो उसने कड़ा पहरा बिठा दिया। उसने नरवर की सीमाओं पर सख्त आदेश दे दिए कि मारवाड़ की तरफ से आने वाले किसी भी संदेशवाहक या डाकिए को राजा ढोला से न मिलने दिया जाए और उन्हें रास्ते में ही मार दिया जाए।

🐫 राजकुमारी मारू का विरह और 'ढोला-मारू रा दूहा'

उधर मारवाड़ (पुंगल) में राजकुमारी मारू यौवन की दहलीज पर कदम रख चुकी थीं। वह बेहद खूबसूरत थीं और सपने में अक्सर अपने पति ढोला को देखती थीं। जब राजा पिंगल ने नरवर कई संदेशवाहक भेजे और कोई वापस नहीं लौटा, तो मारू विरह (Judseparation) के दर्द से तड़प उठीं। उसने अपनी व्यथा को दोहों में पिरोया, जिसे आज राजस्थानी साहित्य में 'ढोला-मारू रा दूहा' कहा जाता है:

"ढोला मारू री बातड़ी, सुणता ही दुख जाइ।

गूंथ्या मुक्तां री लड़ी, हियै हरख ना माइ॥"

        सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवणरी बात।

        जोवन छाई धण भली, तारांछाई रात।। 

ढाढ़ियों (गायक कलाकारों) की चतुराई:

जब कोई सीधा रास्ता नहीं बचा, तो पुंगल के राजा ने चतुर गाडियों/ढाढ़ियों (लोक गायकों) के एक समूह को भेष बदलकर नरवर भेजा। ये गायक नरवर पहुंचे और रिमझिम बारिश की एक रात उन्होंने राजा ढोला के महल के नीचे बैठकर मल्हार राग में राजकुमारी मारू के रूप, उसके विरह और बचपन के विवाह की कहानी को गाकर सुनाना शुरू किया।

गायन में मारू का दर्द और शादी का जिक्र सुनकर ढोला की पुरानी यादें ताजा हो गईं और उन्हें सब कुछ याद आ गया।

⚔️ बाधाएं और ऊंट पर सवार होकर 'नरवर' आगमन

सच्चाई जानने के बाद राजा ढोला अपनी पहली पत्नी मारू को लाने के लिए व्याकुल हो उठे। दूसरी पत्नी मालवणी ने उन्हें रोकने के बहुत जतन किए, लेकिन ढोला एक बेहद फुर्तीले और जादुई ऊंट पर सवार होकर रातों-रात मारवाड़ के लिए निकल पड़े।

पुंगल पहुंचकर ढोला और मारू का पुनर्मिलन हुआ। जब ढोला अपनी सुंदर दुल्हन मारू को ऊंट पर आगे बिठाकर वापस नरवर लौट रहे थे, तो रास्ते में मालवा के एक और ईर्ष्यालु राजा 'उमर सूमरा' ने ढोला को मारकर मारू को हासिल करने की साजिश रची। लेकिन मारू की बुद्धिमानी और ढोला के शौर्य के आगे दुश्मन टिक नहीं सके। वे दोनों सुरक्षित रूप से विंध्याचल की पहाड़ियों को पार कर अपने महल 'नरवर किले' वापस लौट आए।

नरवर पहुंचने पर रानी मालवणी ने भी मारू के दिव्य रूप और व्यवहार को देखकर अपनी कड़वाहट छोड़ दी और दोनों रानियां राजा ढोला के साथ सुखपूर्वक नरवर में रहने लगीं।

🎨 ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व (Historical Legacy)

  • चित्रकला का केंद्र: ढोला-मारू की यह कहानी राजपूत चित्रकला (Rajput Paintings) और विशेषकर मारवाड़ व मेवाड़ स्कूल ऑफ आर्ट्स का सबसे पसंदीदा विषय रही है। आज भी देश-विदेश के संग्रहालयों में ऊंट पर सवार ढोला-मारू के प्राचीन चित्र सहेज कर रखे गए हैं।

  • पर्यटन के लिए संदेश: हमारे नरवर के किले की प्राचीरें, पुरानी कचहरी और महल आज भी गवाही देते हैं कि यह भूमि सिर्फ शूरवीरों की नहीं, बल्कि अमर प्रेमियों की भी रही है।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

ढोला-मारू की प्रेमकथा हमें सिखाती है कि यदि प्रेम में पवित्रता और विश्वास हो, तो सैकड़ों मील की दूरियां, समय का लंबा अंतराल और दुश्मनों की साजिशें भी दो प्रेम करने वालों को अलग नहीं कर सकतीं। ऐतिहासिक नगरी नरवर के गौरव को वैश्विक पटल पर लाने के लिए हमें अपनी इन समृद्ध लोक-कथाओं और इतिहास को संजोकर रखना होगा।


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गुरुवार, 3 नवंबर 2022

नरवर नगर परिषद ने मनाया अनूठा उत्सव, मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर कार्यालय में स्कूली बच्चों ने बनाईं सुन्दर कलाकृतियाँ

नगर परिषद कार्यालय में स्कूली बच्चों ने बनाईं सुंदर कलाकृतियाँ, मंत्री जी ने अवलोकन कर, की सराहना।

नरवर दर्शन. मध्यप्रदेश के 67वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में प्रदेश भर में 01 नवम्बर से 7 नवम्बर तक विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। जिसके क्रम में नगर परिषद नरवर में भी रंगोली, पेंटिंग्स और स्वच्छता श्रमदाम कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। जिसमें नरवर के विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने सुंदर रंगोलियाँ और पेंटिंग्स बना कर नगर परिषद कार्यालय के सुंदरता में चार चाँद लगा दिए।


बच्चों द्वारा बनाई गई रंगोली और पेंटिंग्स का अवलोक श्री जसवंत जाटव, केबिनेट मंत्री दर्जा, मध्यप्रदेश पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम अध्यक्ष ने किया और छात्र-छात्राओं की प्रतिभा की सराहना की। खिलते हुए रंगों और महकते फूलों से बनी रंगोलियों ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।


कला और संस्कृति की विशेष परख रखने वाली नगर परिषद अध्यक्ष श्रीमति पदमा संदीप माहेश्वरी जी ने स्वयं बच्चों के साथ मिलकर रंगोली बनाई और रंगोलियों का अवलोकन कर छात्र-छात्राओं की कलात्मक प्रतिभा की सराहना की और मार्गदर्शन दिया।


स्कूली नन्हें कलाकार बच्चों को संबोधित करते हुए श्री जसवंत जाटव, पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम चेयरमेैन कैबिनेट मंत्री दर्जा ने कहा कि - मध्यप्रदेश अपना 67वां स्थापना दिवस मना रहा है। प्रदेश के मुखिया यशस्वी मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने नईं ऊँचाईयों को छुआ है और कला, संस्कृति, पर्यटन, उद्योग आदि क्षेत्रों में नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उन्होंने कहा कि नरवर को पर्यटन के क्षेत्र में आगे बढाने के लिए अनेक योजनाएँ तैयार की गयी हैं, जिन्हें अमली जामा पहनाया जा रहा है और हमारा नरवर पर्यटन पटल पर एक प्रमुख स्थान होगा। नरवर के विभिन्न शासकीय-अशासकीय विद्यालयों के बच्चों से रूबरू होते हुए मंत्री जी ने कहा कि जैसे श्री शिवराज सिंह चौहान जी पूरे प्रदेश के बच्चों के मामा हैं, तो आज से मैं करैरा विधानसभा के सभी बालक-बालिकाओं का मामा हूँ। जब मंत्री जी ने बच्चों से पूछा कि क्या आपको मंजूर है, तो सभी बच्चों ने एक सुर हाँ कहकर मामा-भांजे के इस संबंध का समर्थन किया।


कार्यक्रम में रंगोली और पेंटिंग्स बनाने वाले बच्चों को मंत्री जी, अध्यक्ष जी, नप सीएमओ और नप पार्षदगणों द्वारा प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कार प्रदान किये गये। मंत्री जी ने बच्चों की सुन्दर पेंटिग्स पर अपनी स्वेच्छा से ही ऑटोग्राफ दिये और उन्हें संभालकर कार्यालय में प्रदर्शित करने के निर्देश दिये। कार्यक्रम में स्वागत भाषण और आभार उपयंत्री श्री आरके जैन ने दिया और मंच संचालन नगर परिषद के पवन सिंह बैश ने किया।


रंगोली-पेंटिंग्स कार्यक्रम के समापन के बाद पुराना थाना ग्राउण्ड में नपाध्यक्ष एवं पार्षदगणों और निकाय के अधिकारी-कर्मचारियों द्वारा सफाई मित्रों के साथ श्रमदान किया गया।


मध्यप्रदेश स्थापना दिवस के इस रंगोली-पेंटिग्स कार्यक्रम में मुख्यरूप से श्री जसवंत जाटव, पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम अध्यक्ष, नगर परिषद नरवर अध्यक्ष श्रीमति पदमा माहेश्वरी, नप उपाध्यक्ष श्री ब्रजेन्द्र गुर्जर, नप सीएमओ श्री प्रवीण कुमार नरवरिया, , नप पार्षदगण श्री धर्मेन्द्र कुशवाह, श्री बालकिशन कुशवाह, श्री राकेश गुड्डू सोनी, श्री शंकरलाल रजक, श्री मनोज मित्तल, श्री टीपू खान एवं नगर परिषद उपयंत्री श्री आरके जैन, लेखापाल श्री अशोक कुमार शिवहरे, एआरआई श्री हबीब मोहम्मद कुर्रैशी, एआरआई श्री धर्मेन्द्र कुमार कोली, श्री दीपक खटीक, श्री अरविन्द शर्मा, श्री गजेन्द्र राठौर, श्री पुरुषोत्तम शिवहरे, श्री पवन सिंह बैश, श्री अंकुर जैन, श्री सुरेश चौरसिया, श्री मनोज सक्सैना, श्री जावेद कुर्रैशी, श्री पंकज चौरसिया, श्री सतीश बाथम, श्री छोटू एवं नरवर की आँगनवाडी कार्यकर्ता/सहायिका एवं शासकीय सीएम राइज विद्यालय, शासकीय कन्या विद्यालय, अशासकीय भारतीय विद्यालय, शौर्य स्कूल, उत्कर्ष विद्यालय के अध्यापक एवं छात्र-छात्राएँ शामिल रहे।

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नरवर दर्शन