Dhanteras 06 November 2026: कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी पर आज से शुरू हुआ पांच दिवसीय दीपोत्सव। जानिए भगवान धन्वंतरि-कुबेर पूजन का स्थिर लग्न मुहूर्त, यम दीपदान का समय, शुभ खरीदारी और पौराणिक कथा।
विशेष डेस्क (नरवर दर्शन)। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के साथ आज 06 नवंबर 2026, शुक्रवार को सनातन धर्म का सबसे बड़ा पंचपर्व 'दीपोत्सव' विधिवत प्रारंभ हो गया है। आज का दिन धनतेरस अथवा धनत्रयोदशी के रूप में पूरे देश और अंचल में अपार श्रद्धा, उमंग और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आज ही के दिन समुद्र मंथन के दौरान आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसी कारण इस पावन दिन को आरोग्यता, समृद्धि और दीर्घायु के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। आज के दिन धन के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर, मां महालक्ष्मी और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने वाले यमराज की विशेष आराधना की जाती है।
🪔 धनतेरस 2026: पूजा और शुभ चौघड़िया मुहूर्त
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार धनतेरस की पूजा हमेशा प्रदोष काल और स्थिर लग्न (वृषभ लग्न) में करना सर्वोत्तम माना गया है, ताकि घर-परिवार में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य स्थिर रहे।
प्रदोष काल मुहूर्त (सर्वोत्तम पूजा समय): शाम 06:02 बजे से रात 08:15 बजे तक
वृषभ लग्न (स्थिर लग्न): शाम 06:08 बजे से रात 08:04 बजे तक
यम दीपदान का समय: सूर्यास्त के तुरंत बाद, शाम 05:48 बजे से 07:15 बजे तक
दिनभर खरीदारी के शुभ चौघड़िया मुहूर्त:
चर एवं लाभ का चौघड़िया (दोपहर): दोपहर 12:15 बजे से 02:40 बजे तक
अमृत चौघड़िया: दोपहर 02:40 बजे से शाम 04:05 बजे तक
शुभ चौघड़िया (शाम): शाम 05:30 बजे से 07:05 बजे तक
🛍️ क्या खरीदें और किन चीजों से बचें?
धनतेरस पर की गई खरीदारी अक्षय (जिसका कभी क्षय न हो) फल प्रदान करती है:
क्या खरीदना अत्यंत शुभ है:
पीतल व तांबे के बर्तन: भगवान धन्वंतरि पीतल के कलश के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए पीतल के बर्तन खरीदना आरोग्यवर्धक माना जाता है।
सोना और चांदी: 24K या 22K सोने के आभूषण, चांदी के सिक्के, चम्मच या मां लक्ष्मी-गणेश की अंकित मुद्राएं।
झाड़ू: झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीकात्मक स्वरूप माना गया है। धनतेरस पर सींक या फूल झाड़ू घर लाने से दरिद्रता का नाश होता है।
साबुत धनिया और खील-बताशे: साबुत सूखा धनिया सुख-समृद्धि का प्रतीक है। इसे आज खरीदकर दीपावली पूजन में रखा जाता है और बाद में क्यारियों या गमले में बोया जाता है।
मिट्टी के दीये और लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा: दीपावली की मुख्य पूजा के लिए मिट्टी के सुंदर दीये और प्रतिमाएं आज ही घर लानी चाहिए।
इन चीजों को खरीदने से बचें:
लोहे की वस्तुएं, नुकीले औजार (कैंची, चाकू), एल्युमिनियम और प्लास्टिक के सामान तथा गहरे काले रंग के वस्त्र खरीदने से बचना चाहिए।
🕯️ यम दीपदान: अकाल मृत्यु से रक्षा का महा-अनुष्ठान
धनतेरस की शाम को यमराज के निमित्त दीपदान करने का विधान है। स्कंद पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन यम दीपदान करता है, उसके परिवार में कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
यम दीपदान की सरल विधि:
एक चौमुखी मिट्टी अथवा आटे का बड़ा दीपक बनाएं।
उसमें सरसों या तिल का तेल डालकर चार बत्तियां (रुई की) लगाएं।
दीपक में एक तांबे का सिक्का, कौड़ी अथवा थोड़ी सी खील-अक्षत डालें।
शाम को घर की सभी बत्तियां जलाने के बाद, इस दीपक को जलाएं।
घर की सबसे वयोवृद्ध महिला या परिवार का कोई भी सदस्य इस दीपक को हाथ में लेकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर दाहिनी ओर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अक्षत की ढेरी पर स्थापित करे।
हाथ जोड़कर प्रार्थना करें:
"मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥"
(अर्थात: त्रयोदशी के दीपदान से यमराज, उनकी शक्ति और मृत्यु के दूत प्रसन्न हों और हमें दीर्घायु प्रदान करें।)
दीपक रखने के बाद पीछे मुड़कर न देखें और सीधे घर के अंदर आ जाएं।
📖 धनतेरस की पौराणिक कथाएं
1. धन्वंतरि प्राकट्य और अमृत कलश:
देवताओं और दानवों के बीच हुए क्षीरसागर मंथन के चौदह रत्नों में से जब भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत से भरा स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए, तो उस दिन कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी थी। उन्होंने संसार को वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों और आयुर्वेद के ज्ञान से अभयदान दिया।
2. राजा हिम के पुत्र और चतुर वधू की कथा:
राजा हिम के पुत्र की कुंडली में विवाह के ठीक चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का श्राप था। जब चौथा दिन आया (जो धनत्रयोदशी का दिन था), तब उनकी नवविवाहिता पत्नी ने कमरे के बाहर सोने, चांदी और पीतल के बर्तनों व आभूषणों का ऊंचा ढेर लगा दिया और चारों तरफ तेल व घी के सैकड़ों दीये जला दिए। वह रातभर अपने पति को जागृत रखने के लिए भजन-कीर्तन और कहानियां सुनाती रही।
जब मृत्यु के देवता यमराज सर्प का रूप धारण कर आए, तो दीपों और आभूषणों की प्रचंड चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। वे उस कक्ष के भीतर प्रवेश नहीं कर सके और आभूषणों के ढेर पर बैठकर रातभर मधुर कथा सुनते रहे। सुबह होते ही मृत्यु की घड़ी टल गई और यमराज शांत मन से लौट गए। तभी से इस दिन दीपदान और आभूषण खरीदने की परंपरा आरंभ हुई।
🕉️ भगवान धन्वंतरि व कुबेर देव की शास्त्रीय पूजन विधि
शुद्धिकरण व स्थापना: ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या उत्तर दिशा में एक चौकी पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं।
प्रतिष्ठा: चौकी पर भगवान धन्वंतरि, कुबेर देव, मां लक्ष्मी और श्रीगणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें।
अभिषेक व तिलक: गंगाजल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं। चंदन, अक्षत, रोली, अबीर, और पीले/सफेद पुष्प अर्पित करें।
नैवेद्य अर्पण: भगवान धन्वंतरि को मौसमी फल, पंचामृत और पीली मिठाई का भोग लगाएं। कुबेर देव को धनिया और खील-बताशे अर्पित करें।
मंत्र जाप:
भगवान धन्वंतरि मंत्र:
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सकलभयविनाशाय त्रैलोक्यनाथाय नमःकुबेर मंत्र:
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥
आरती व क्षमा याचना: धूप, दीप और कर्पूर से सभी देवताओं की आरती उतारें और परिवार के उत्तम स्वास्थ्य तथा समृद्धि की कामना करें।
🚩 नरवर अंचल में धनतेरस की रौनक
ऐतिहासिक नगरी नरवर के प्रमुख बाजारों, मैन मार्केट, मगरौनी रोड और सदर बाजार में सुबह से ही ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। बर्तन दुकानों, सराफा प्रतिष्ठानों और ऑटोमोबाइल शोरूमों पर आकर्षक सजावट के साथ बंपर बिक्री का माहौल है। नरवर के ऐतिहासिक मंदिरों में शाम ढलते ही दीपमालाओं का मनोहारी दृश्य देखते ही बन रहा है।
आप सभी पाठकों को 'नरवर दर्शन' परिवार की ओर से धनतेरस एवं दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं! भगवान धन्वंतरि आपके जीवन को निरोगी काया और कुबेर देव अटूट संपन्नता से परिपूर्ण करें।

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